(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.262. अध्यायः 262
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति नारदाकम्पनसंवादानुवादः॥ 1॥ नारदेनाकम्पनं प्रति स्थाणुप्रजापतिसंवादानुवादारम्भः॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिरं उवाच। 12-262-0x(6273)(75779)
य इमे पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले।
पृतनामध्य एते हि गतसत्त्वा महाबलाः॥ 12-262-1(75780)
एकैकशो भीमबला नागायुतबलास्तथा।
एते हि निहताः सङ्ख्ये तुल्यतेजीबलैर्नरैः॥ 12-262-2(75781)
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे पुरा।
विक्रमेणोपसंपन्नास्तेजोबलसमन्विताः॥ 12-262-3(75782)
अथ चेमे महाप्राज्ञाः शेरते हि गतासवः।
मृता इति च शब्दोऽयं वर्तत्येषु गतासुषु॥ 12-262-4(75783)
इमे मृता नृपतयः प्रायशो भीमविक्रमाः।
तत्र मे संशयो जातः कुतः संज्ञा मृता इति॥ 12-262-5(75784)
कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः।
हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह॥ 12-262-6(75785)
भीष्म उवाच। 12-262-7x(6274)
पुरा कृतयुगे तात राजा ह्यासीदकम्पनः।
स शत्रुवशमापन्नः संग्रामे क्षीणवाहनः॥ 12-262-7(75786)
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले।
स शत्रुभिर्हतः सङ्ख्ये सबलः सपदानुगः॥ 12-262-8(75787)
स राजा शत्रुवशगः पुत्रशोकसमन्वितः।
यदृच्छया शान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम्॥ 12-262-9(75788)
तस्मै स सर्वमाचष्ट यथावृत्तं जनेश्वरः।
शत्रुभिर्ग्रहणं सङ्ख्ये पुत्रस्य मरणं तथा॥ 12-262-10(75789)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदोऽथ तपोधनः।
आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा॥ 12-262-11(75790)
नारद उवाच। 12-262-12x(6275)
राजञ्शृणु महाख्यानं ममेदं बहुविस्तरम्।
यथावृत्तं श्रुतं चैव मयाऽपि वसुधाधिप॥ 12-262-12(75791)
प्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः।
अतीव वृद्धा बहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः॥ 12-262-13(75792)
न ह्यन्तरमभूत्किंचित्क्वचिज्जन्तुभिरच्युत।
निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप॥ 12-262-14(75793)
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते।
चिन्तयन्नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम्॥ 12-262-15(75794)
तस्य रोपान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत।
तेन सर्वा दिशो राजन्ददाह स पितामहः॥ 12-262-16(75795)
ततो दिवं भुवं खं च जगच्च सचराचरम्।
ददाह पावको राजन्भगवत्कोपसंभवः॥ 12-262-17(75796)
तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च।
महता क्रोधवेगेन कुपिते प्रपितामहे॥ 12-262-18(75797)
ततो हरो जटी स्थाणुर्देवोऽध्वरपतिः शिवः।
जगाम शरणं देवो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्॥ 12-262-19(75798)
तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया।
अब्रवीद्वरदो देवो ज्वलन्निव तदा शिवम्॥ 12-262-20(75799)
करवाण्यद्य कं कामं व्नरार्होऽसि मतो मम।
कर्ता ह्यसि प्रियं शंभो तव यद्धृदि वर्तते॥ ॥ 12-262-21(75800)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 262॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-262-1 गतसंज्ञा महाबला इति थ. पाठः॥ 12-262-16 खेभ्य इन्द्रियच्छिद्रेभ्यः॥ 12-262-17 खं खस्थं ग्रहनक्षत्रादि॥ 12-262-19 स्थाणुः श्मशाननिलयः शिव इति ड. थ. पाठः॥


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